खदान का अंधेरा और उम्मीद की किरणें…

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काली-अँधेरी सुरंगों में
टिमटिमाती सी रौशनी लेकर
चिपचिपाती सी देह में कांटे
चुभ रहे, टीस-टीस पीड़ा है
ज़िन्दगी खेल नही सर्कस का
हर कदम एक नया खतरा है
मौत की आहटें डराती हैं
जीने की ख्वाहिशें बुलाती हैं
और हम रिस्क लेके चलते हैं
मौत को चकमा देते रहते हैं

एक उम्मीद साथ चलती है
बच रहे तो मिलेंगे अपनों से
खुद से भी और अपने सपनों से…

बच रहे तो मिलेगा सूरज भी
जिसकी किरणों का सेंक हर लेगा
पोर-पोर में समाई पीड़ा को
इक नई ऊर्जा जो भर देगा…

कोयले की भूमिगत खदानों में
काम करने वाले लोगों से
रौशनी की जो पूछिए कीमत
अपने सीने के अँधेरे कोनों में
बड़े जतन से संजोये रखते हैं
रौशनी की एक-एक किरणों को…..

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