इश्क तो खुमार है और कु्छ नहीं-शिवचरण दास

इश्क तो खुमार है और कु्छ नहीं
दर्द का गुबार है और कुछ नहीं ॥

ढल रहे हैं सिर्फ सिक्के आदमी की शक्ल में
दूर तक खुमार है और कुछ नहीं ॥

इस तरफ तो खूं के आंसू हैं हर एक आख मे
और उस तरफ बहार है और कुछ नहीं॥

क्यूं पहाडे लिख रहा है उंगलियों पर
बस अर्थ की भरमार है और कुछ नहीं  ॥

चढ गया जो खुद सलीब पर हमारे वास्ते
वो असली गुनहगार है और कुछ  नहीं ॥

बस गरीबों  को मिलेगी कुछ खुशी खैरात मे
यह आखिरी हथियार है और कुछ नहीं ॥

ब्याज का हर सांस है ता उम्र चुकाना है
हर दिन नया उधार है और कुछ नहीं ॥

“दास” लगता हो गले जो बेसबब ही आदमी
वो जहर की कटार है और कुच नहीं ॥

—————————शिव चरण दास

 

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