नज़्म – नींद

किसी दिन आके

हाथ फैलाये

खड़े हो जायेंगे

 

मेरी नींद के टुकड़े

जिन्हें तकिये के निचे

छुपाके रखता हूँ

जिन्हें रात को

उठ उठ कर देखता हूँ

कहीं मेरे अरमानों की तपिश से

पिघल न जाये

 

एक ख्वाबों का पौधा

जो सिरहाने रख्खा था

मेरी रीढ़ की हड्डी

पकड़ के खड़ा होना चाहता है

 

और मैं

बची हुयी साँसों से

कहता हूँ

एक दिन और सही

एक रात और सही

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