“तनख्वाह”

जो चीज अच्छी है लगी, वह मन को मेरे भा गई।
मैं सोचता लिखता रहा, फिर नींद मुझको आ गई।।
फाइलों के बोझ से, बोझिल हमारी जिन्दगी-
जो मिली तनख्वाह मुझको, वो भी तन को मेरे खा गई।।
रचनाकार :::: मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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  1. सुनील लोहमरोड़ Sunil Kumar 06/02/2014

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