नहीं आसन मिटाना तेरी याद …

समय के गलियारे में
खुबसूरत से याद मारे-मारे
फिरते है,
सोचा कैद करू सदूक में
पर ये तो
मेरी तरह मलंग
स्वतंत्र लगते है

चुभते बनके शुल
कभी चुभे तो टपके खून
न आंसू बहे, न आह! निकले
खामोशी से मेरी जान निकले

बताना भी मुश्किल
छिपना नहीं आसन
भीतर –भीतर जलाके के
खाक करे मुझे
बुझाना नहीं आसन
कैसे मिटाऊ तेरी याद

नहीं आसन मिटाना तेरी याद …

6 Comments

  1. सुनील लोहमरोड़ Sunil Kumar 06/02/2014
    • Rinki Raut Rinki Raut 07/02/2014
  2. नादिर अहमद नादिर 07/02/2014
    • Rinki Raut Rinki Raut 07/02/2014
  3. ashutosh 08/03/2014
    • Rinki Raut Rinki Raut 08/03/2014

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