कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है।

कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है।
मगर कुर्सी की बैचेनी को, बस “कजरी” समझता है। –

मैं कुर्सी से दूर कैसा हूँ, मुझसे कुर्सी दूर कैसी है !
फकत शीला समझती है या मेरा दिल समझता है !! –

सत्ता एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी शीला दीवानी थी कभी कजरी दीवाना है ! –

यहाँ सब लोग कहते हैं कजरी सत्ता पिपासु है।
अगर तुम समझो तो ढोंगी है जो ना समझो तो साधू -है। –

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
ये बंगला और ये गाड़ी, मैं इसको खो नही सकता !! –

मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो शीला का न हो पाया, वो मेरा हो नही सकता !! –

भ्रमर कोई अगर कुर्सी पर जा बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में सत्ता का जो ख्वाब आ जाये तो हंगामा!! –

अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा कुर्सी का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!

Leave a Reply