कम्बखत “खांसी” है कि जाती नहीं है

 

मगर शर्म हमको आती नही है

लूटती रहे “अबला” की “आबरू” सड़कों पर मगर करें क्या “मर्द” वाली हमारी “छाती” नहीं है…………………

कम्बखत “खांसी” है कि जाती नहीं है

मगर शर्म हमको आती नही है

दिखा कर दिन में हसीन सपने बना गया पागल अब नींद रात को कभी आती नही हैं……………………….

कम्बखत “खांसी” है कि जाती नहीं है

मगर शर्म हमको आती नही है

कहता था सुनूंगा बात सबकी मैं यहाँ पर मगर साँसे भी हमारी उसको अब सुहाती नही है……………… कम्बखत “खांसी” है कि जाती नहीं है

मगर शर्म हमको आती नही है

इंसान को इंसान से मिलाने का किया जो वादा “आप” ने मगर मालूम हुआ “आप” कि तो इंसान कि जाति नही हैं…………………

कम्बखत “खांसी” है कि जाती नहीं है

मगर शर्म हमको आती नही है

 

कोमल प्रसाद साहू ”महराज”

”पागल

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