घूमने जाऊँ कहाँ

घूमने जाऊँ कहाँ
कहाँ
खड़ा रहूँ
सिमट जाती हैं
मेरी कहानी
किसी अनजाने
गधे को देखकर !
दरवाजे पर खटखटाने की आवाज
फोन की घंटी
मुडेर पर
बैठी चिड़िआ
बातें करती है
सुबह ,
मुझ जैसे पागल
इंसान से!
तभी मैं दौड़कर
ले आता हूँ
लड्डू गुलाब जामुन
ऊँची दुकान से
और खिला देता हूँ
दुर्बल बेचारे गधे को
फूल माला भी
पहना देता हूँ
हॅस-हॅस कर
अपनी नाक पोंछकर
दुनिआ वालों के सामने !
कवि- अशोक बाबू माहौर

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