इन्दु

आसमान को हर्ष विभोर कर देती है,
इन्दु तेरी शीतलता,
मेरे अन्र्तमन को मुग्ध सी कर देती है,
इन्दु तेरी निश्छलता,
इस बेजार रात में भी करता है,
इन्दु तु अठखेलियां,
देख तेरी अष्ट कलाओं को इन्दु,
लौट आती मेरी चंचलता,
बिखेर चांदनी सुदुर तक तु कभी-कभी,
है मंद-मंद मुस्काता,
छिप जाता है कभी, परदे में शायद
तु है चांदनी से कुछ शरमाता,
देख तेरी ये अदा निराली तारागण भी,
लगता है टिमटिमाने,
के कुछ पल प्रेम में बिताने दे मुझे,
शायद तु हो चांदनी से कुछ फरमाता,
मगर तु पल भर में फिर लौट आता है,
फिर शीतलता बरसाने,
मन विभोर हो उठता है फिर से,
देख तेरी पराकाष्ठा,
देख तारागण का समर्पण तेरी निष्ठा पे इन्दु,
हलचल सी होती है बेजार दिल में,
मेरा सुप्त अन्तर्मन फिर जाग उठता है,
फिर बंध जाती उसके प्रेम निष्ठा।।
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