“महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी को श्रद्धा सुमन”

सू-       सूर्य के समान तेज सुकवि सुधीर,
सिन्धु सभ्यता-संस्कृति का महान रखवाला था।

र्य-       यती था तपस्वी- था काव्य में यशस्वी,
मनुजता के रंग में जीवन रंग डाला था।।

कान्-    कान्त लिए चेहरे पर करुणा का सागर,
था, उद्‌घोषक क्रान्ति का बन जाता ज्वाला था।

त-        तनिक भी अहम नहीं उसके व्यवहार
में तेवर था गजब का, वह महाकवि निराला था।।

नि-       निद्रा-निशा कुछ उसका न बिगाड़ सकी,
शोषितों व दलितों को दिलाता सदा त्राण था।

रा-        रास नहीं आया बनवती स्नेह उसे,
छोड़ता वह ओज भरी कविता का बाण था।।

व्यथित हो जाता था गरीबों की गुहार सुन,
मांसहीन पिंजर में, शेष रहा हाँण था।

ला-        लालिमा उजागर किया भोगे हुए सत्‍य का,
कालजयी कवि गुरु निराला महाप्राण था।।

रचनाकार :::: मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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