क्या कहिये

बच्चे तो बच्चे हैं जनाब आजकल तो बड़ो को क्या कहिये
हमने तो बस सींचा वृक्ष, अब उनकी जड़ो को क्या कहिये

बहुत सी मुसीबतों को दरकिनार किया अपनी हिम्मत से
जीवन की जंग में ऐसी बहुत सी पतझड़ों को क्या कहिये

हम साधारण हैं हमें ऐसे ही रहने दो, हमें ख़ास न बनाओ
तौबा तौबा ये मारा -मारी, अब ऐसे लफड़ों को क्या कहिये

कभी इधर तो कभी उधर न जाने वह गया किधर, समझें
ये अपने देश के नेता हैं तो ऐसे चिकने घड़ों को क्या कहिये

करतें रहते हैं हर बात पर गिला शिकवा जो जानते बूझते
बचना इस प्रवृति के लोगों से ऐसे नकचड़ों को क्या कहिये

न ब्याह रचाया न घर ही बसाया अब क्या है इरादा ‘चरन’
उम्र ढलेगी तो जानोगे बड़े बोलते थे ऐसे छड़ों को क्या कहिये
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त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

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