नज़रे

खिलखिलाती मुस्कराती
वो सुरगमी नज़रे
भटकती दर बदर
कुछ तलाशती नज़रे

चमकती चाँद में चमचमाती
चाँद कि नज़रे
सुबह को झिलमिलाकर रोकती
गुलाबी लाल वो नज़रे

रखू में कैसे उसको
दिल मैं अपने इस तरीके से
दिल के हर बार आर पार
तेरी वो झाकती नज़रे

रहू में आख़िरश कैसे
दूर यु भला तुझसे
मुझे ही हर घडी हर पहर
वो तेरी ताकती नज़रे

ढूढ़ता घूमघूमकर
वो दुर्गमि मोती
चमकर फिर वो छुप जाती
तेरी सीप सी नज़रे

बैठू चुपचाप खुद को थाम
तेरे सामने कैसे
हंसती गुलगुलाती मुझे
तेरी नर्म सी नज़रे

eye

आज जो फिर मिली हो तो
क्यों ऐसे मोड़ती नज़रे
सदी के सिलसिलो को यु
पल में तोड़ती नज़रे

रख सम्भाल के अबकी
ये अपनी महकशी नज़रे
दिल से दिलो ही
फिर से जोड़ती नज़रे

लड़ती फिर झगड़ती
मुझसे वो तकरार कि नज़रे
देखती मुस्कुराती फिर
वो तेरी प्यार कि नज़रे

लजाती देखकर वो फिर मेरी
इज़हार कि नज़रे
पलके हिला पुतली नचा
गाती कुछ तेरी नज़रे

उठाकर पलकों को मुझको
फलक पर बिठा देती
मिलाती झिलमिलाती तेरी
इकरार  की ….

                                                                                                                                                    —   दीक्षित 

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