हराम या मासूम

एक मासूम सी थी
हाथो में कुछ थाम के
सुर्ख चेहरे फटे कपडे
कुछ गालिओ से नाम थे

याद कुछ भी नही ढंग से
मगर भूला नहीं कुछ भी
रोते ठोकरे खाते थे
ये किस्से हर गली में आम थे

begger

कुछ हमसे भी ठलुए थे
जो रुक के आँसू बहा गये
मगर खुदगर्ज हम भी थे
हमको  भी घर पे काम थे

किसी ने चन्द रोज का
पाप कचरे में फैका था
खुद कि रहमतो के भी
यही इनाम यही अंजाम थे

मुग़फ़ली चबाते हुए बस
शराफत मश्वरा करती रही
कैसी गन्दगी थे ये
किस प्यार का अंजाम थे

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