उस घर कि खिड़कियाँ

कुछ करवटें, कुछ कराहटें

कुछ सन्नाटें , कुछ आहटें

कुछ निशानियां, कुछ लिखावटें,

कुछ ठहाकें, कुछ सिसकियाँ,

कुछ लोरियाँ, कुछ किलकारियाँ

कुछ मायूसियाँ , कुछ मुस्कुराहटें

कुछ खामोशियाँ, कुछ चिल्लाहटें

कुछ नजदीकियां, कुछ दूरियां

कुछ नादानियाँ,  कुछ मजबूरियां

कुछ अनदिखे ,  कुछ अध्-दिखे सपने

कुछ बंद दरवाजे, कुछ खुली खिड़कियाँ

कुछ सिमटीं  , कुछ बिखरी

कुछ पूरी , कुछ अधूरी

यादें खुद-ब-खुद  चली आती हैं

मेरे सपनो के साथ,

मेरे हर एक आशियानें पे.

–  आशुतोष

 

 

One Response

  1. ashutosh 31/01/2014

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