मुझे रचती है जो कविता

मुझे रचती है जो कविता
रोंये भी खिलखिलाते है
कलम हॅस हॅस के कहती है
तुम्हे ये गुर भी आते है

मैं कहता हुँ सुनो प्रियतम
मेरा सृंगार तुम तक है
जो तू खिल खिलाती है
तो हम भी खिलखिलाते है

3 Comments

  1. yashodadigvijay4 31/01/2014
  2. Kavita Rawat 01/02/2014
    • दीक्षित दीक्षित 01/02/2014

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