“हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है”

हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है।
जनम-जनम तक धरती माँ से, रहा हमारा नाता है।।
ये शस्य-श्यामला वसुन्धरा, हमको प्राणों से प्यारी है।
इसके हित जीना-मरना ही, ये शास्वत नीती हमारी है।।
इसको जो आँख दिखायेगा, उसकी हम आँख निकालेंगे।
मातृभूमि पर हम अपना तन – मन – धन दे डालेंगे ।।
हम सबकी जीवन-दाता ये, हम सबकी भाग्य विधाता है।
हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है।।
इसकी महिमा है अनंत, है मोल बहुत इस माटी का।
सारा जग है इसका कायल, इसकी पावन परिपाटी का।।
सिंकोना, कहवा, रबर, तम्बाकू, गन्ना, फल, खादी ।
तांबा-लोहा से लेकर, हीरा-मोती सोना-चाँदी।।
ये सारे खनिज पदार्थ हमें, धरती माँ हमको देती है।
बदले में हमसे कहीं भी, तो वो नहीं कुछ लेती है।।
भारत माँ की धरती का गौरव सारे जग को अति भाता है।
हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है।।
चावल, गेहूं, चना, धान, अनगिनत अन्न उपजाती है।
अरहर, उरद, मूंग, सब्जियाँ, खाने में सबको भाती है।।
सेब, आम, केला, लीची, सन्तरा आदि फल खाने को।
यह देंन इसी धरती माँ की, हर वस्तु यहाँ है पाने को।।
सचमुच यह धरती माँ ही तो, हम सबकी, जीवनदाता है।
हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है।।
साखू, शीशम, सागौन काठ हैं, इसी धरा पे खड़े घने।
निर्माण कार्य बालू-मौरंग से, मन्दिर भवन विशाल बने।।
हैं जड़ी-बूटियाँ विविध यहाँ, जो रोग सभी हर लेती हैं।
इसकी हरीतिमा मानव के, नयनों को ज्योति देती हैं।।
इस माटी का मोल बहुत, जन-जन इसका गुण गाता है।
हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है।
– रचनाकार ::  मन मोहन बाराकोटी ‘तमाचा लखनवी’

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