“किसी भांति कटुता न पालिये”

शान्ति के वातावरण में खुश रहें सभी लोग,
शान्ति के नगर में मित्र विध्न नहीं डालिये।
देखते हो मुल्क में घूमते हैं जगह-जगह,
कर रहे हैं अपनों से ठगी आज जालिये।।
बाँबियों से निकले हैं नाग मजहबी हैं आज,
सब तरफ हैं विषधरों के फन आज कालिये।
ये देश का सवाल है ऐ भाई मेरे मानिये,
आपस में किसी भांति कटुता न पालिये।।
– रचनाकार :: मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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