घुट-घुट कर जी रहें हैं।

बेवजह कुछ लोग यहाँ, घुट-घुट कर जी रहें हैं।
फिर भी ना जाने क्यों वे, घूंट विष का पी रहे हैं।।
गम है हादसों का तो, पीने से क्या फायदा-
धन्य हैं वे जो मस्ती में, संघर्षों के सहारे जी रहें हैं।।
– रचनाकार ::  मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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