भूत लातों के नहीं, मानते हैं बातों से।

नहीं यकीन रहा, अब तो रिश्ते-नातों से।
घर के भेदियों से, परेशान उनकी घातों से।
अब सिधाई का जमाना, नहीं रहा यारों-
भूत लातों के नहीं, मानते हैं बातों से।।
– मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”

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