हाल-ए-दिल (चार शायरी)

____________(१)_____________
तुझे पाने की कोशिश में हम कसूरवार बन बैठे,
तेरे लिए हम सारे ज़माने के कसूरवार बन बैठे ।
तेरे प्यार के लिए सारे ज़माने को रुसवा कर दिया,
एक खुद बचा था अब उसके भी गुनाहगार बन बैठे ॥

____________(२)_____________
खुदा ये कैसी जिंदगी दे दी, जिसमें नज़ारे रोज बदलते हैं,
हंसकर जीने की तमन्ना को, ज़माने के सरे लोग कुचलते हैं।
जो भरी हैं तकलीफ तुमने मेरी लकीरों में उसे सुनकर,
कोई आता नहीं दुबारा, महफ़िलों में हमारी लोग बदलते हैं।।

____________(३)_____________
उसे पा भी नहीं सकता, उसे खोना भी नहीं चाहता,
अकेला हंस भी नहीं सकता, अकेला रोना भी नहीं चाहता ।
ये कैसी विडम्बना है मेरे तन्हा जीवन के सफ़र की,
बेपनाह चाहता भी उसी को हूँ, जो मेरा होना ही नहीं चाहता ।।

____________(४)_____________
जब भी किसी के दिल में जगह बनाई,
हम अक्सर वहां से रो कर निकले हैं,
भ्रम रहता है लोगों को कि,
हम किसी के हो कर निकले हैं ।
दिल हर बार टकराता है बेवफा से,
मिट्टी की तरह बिखर जाते हैं आशियाने,
हम बदनसीब हैं जो हर बार,
हर बस्ती से सब कुछ खो कर निकले हैं ।।
____________

2 Comments

  1. TIGERS 24/01/2014

Leave a Reply