अकेली हस्ती

हमें उसकी मुहोब्बत उसकी वफ़ा रुलाती है,
उसे भूलूं तो वो पगली ज्यादा याद आती है।

गैरों की पनाहों में देख कर उनको,
दिल सिसकता है मेरा, आँख भर आती है॥

सोच रहा हूँ क्यू झूठे वादे किये उसने,
सोचूं तो मेरी मुहोब्बत कमजोर नज़र आती है।

उसके साथ गुजरे हंसी पलों को कैसे भूलूं,
मेरी रूह तक में वो ही वो नज़र आती है॥

क्या ख़ुशी देगा वो जो मैं न दे पाया,
कुछ भी बताने से वो मुकर जाती है,

लाख करो कोशिश किसी को पाने की,
जिनकी हस्ती अकेली हो वो अकेली ही रह जाती है॥
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