इश्क कि अरमान

नाम पुछने कि कभी जरुरत न हुई
हम तो उन्हें मेरी जान कहते हैं
जानना चाहते है कि हम कौन हैं
तो लीजिए हमें भी अनजान कहते हैं
इश्क हमें लगता इबादत से कम नहीं
भरोसा हैं इस पर तो ईमान कहते हैं
बिन बुलाए कोई दर पर पहुच जाए तो
खातिर होती उस्कि और मेहमान कहते हैं
हटती नजर नही उनसे इसमे कसूर क्या
ऐसे चाहनेवाले को कदरदान कहते है
बाते दिल कि जो इजहार न हो पाए
उसे छुपे हुए इश्क कि अरमान कहते है
हरि पौडेल
नेदरल्याण्ड

Leave a Reply