करता रहा

एक अजीब सी कशिश थी, मै शब्दों से प्यार करता रहा
यूँ समझिये कि बस हर शब्द में माँ के दीदार करता रहा

क्या रदीफ़,क्या शिल्प, बहर कुछ भी सीख न पाया मैं
कलम जो पकड़ी तो, हर शब्द पर इख्तियार करता रहा

किसी ने कहा अच्छा है तो किसी ने जलील भी किया
भूल कर चुभन सारी, हर बात दरकिनार करता रहा

कभी दिन में कभी रात में, कभी हंसकर कभी रोकर
पर हिम्मत न हारी और कोशिश बार बार करता रहा

शब्दों की हर बूँद को संजोया, समेटा, और सहेजा मैंने
अपने दिल के आईने में शब्दों को आर पार करता रहा

इसे शौक न समझना यारों ये तो एक जूनून है “चरन”
जैसे मिट्टी को गढ़ बर्तन, कोई कुम्हार करता रहा
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त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

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