घर में नहीं है रोआन घर

हर घर की तरह-
घर में है स्नान घर,
रसोई घर,
बरामदा और आंगन।
देवता घर में मौजूद हैं सारे देवी देवता,
रोज बाबा पूजते हैं उन्हें,
शाम में आरती के बाद बांटते हैं मिसरी और गूड,
बच्चों की टोली पूजा से ज्यादा करते हैं इंतजार प्रसाद की,
घर में किसी को मांगना हो कुछ भी तो हाजिरी बजा आते हैं,
इस बरस बबुआ को घर भेज दो।
घर में सबकुछ है अपनी जगह,
तुलसी और नाद भी,
कभी होती थी जर्सी गाय,
खाती थी मुंह डाल,
अब बाबा से नहीं होता सेवा टहल,
नाद में उगाए गए हैं,
फूल पत्तियां,
अनार, अमरूद।
छत के कोने में पड़ा नाद बतात है
अपनी नई भूमिका,
गाय भैंस अब रहती हैं नन्हूं के दलान में,
मांगने पर शुद्ध दूध,
मंुह बिचका कर कहते हैं,
कहां पचा पाएंगे बाबा,
छेरनी लग जाएगी।
ढूंढता हूं घर में,
एक रोआन घर,
ज्हां जिसे जब रोने का मन करे तो रो आए,
खुले गले से,
कह आए अपनी मन की बात,
आंसूओं के बोझ से पलकें,
हमेशा बोझिल रहती हैं आज कल,
रोआन घर किसी ने नहीं बनाया,
किसी भी घर के नक्शे में नहीं मिला इसकी जगह।

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