भटकाव

मैं किसलिए आया था
घर छोड़कर इस नगर में
और हर साल कहता हूँ कि
मुझे घर जाना है,
जबकि धीरे -धीरे
बना लिए हैं घर हमने
उस खाली मैदान में
टाटों और पैबंदों से |
दो जून की रोटी मिल रही है सुख से
सब्जी भी दिखाई देती जब-तब
फिर भी हम क्यों हर साल कहते हैं
कि इस साल जाना है घर |
मुझे लतियाया जाता
घरों को ढहाया जाता
गालियां सुनायी जातीं
पर यही है घर
जिसकी तलाश में
मैं दुनिया के इस कोने से उस कोने तक
मारा -मारा फिरता रहा
पहचानों को छोड़कर
नया -नया ठौर अपनाने को मजबूर |
इस अनजान नगर में
जिसकी अट्टारिकाओं को
उठाने में हमने अपनी गर्दन तोड़ी है
कब दे पायेगी हमें अपना घर,
ताकि मैं कह सकूं कि
यही है अब मेरा घर |

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