अंत

अंत इतना समीप होने पर भी
पता क्यों नहीं चला !
हम जलते रहे तब भी
अपनी दुनियावी मायाओं में |
कुछ कर लेते जप और तप भी ,
कुछ देते सन्देश अपनों को
उन्हें बता देते रावण की अंतिम सीख की तरह
कि कौन बुनियाद सही है
कि क्या करने से जिंदगी चलेगी ठीक से
कि कौन राह है जिस पर चलने से
धोखा नहीं मिलेगा
और प्रियतम का साथ
मिलता रहेगा अनवरत |
जिंदगी भर मैं यही ख्याल पाले रहा
कि मेरे पूर्वज जो स्वर्ग में रहते हैं
बड़े समझदार हैं
और उनसे नहीं हो सकती है कोई भी गलती |
पूर्वज तो मैं भी बन गया
पर मैं मरने पर भी वही रहा
जैसा बचपन में था
और नहीं समझ पाया
कि मौत को कैसे मैं महाज्ञान में बदल दूं
और अपने को किसी पैगम्बर सा घोषित कर दूं |
मरते समय भी मेरी महत्वाकांक्षाएं
ठीक वहीँ की वहीँ रह गयीं
और कागज के दो नोट
या चार लकीरों से बनी ओरियानी से हटकर
दो गज जमीन और दो गज कफ़न में
ही दफन हो गयीं |

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