किताबें रिटायर नहीं होतीं-

हमारे बीच से किसी दिन यूं ही गुम हो जाती हैं,
इनके हर शब्द हमारे सामने पुकारती हैं,
पढ़ो तो जी,
ज़रा सुन तो लो,
लेकिन हम बहरे की तरह सुन नहीं पाते।
किताबें बेटी की तरह-
एक दिन लेखक का घर छोड़,
पाठक के घर चली जाती हैं,
सज संवर कर,
आलोचक दुलराता, पुचकारता,
तो कभी दुत्कारता रहता,
किताबें पाठक की होती हैं।
एक बार जन्मने के बाद-
किताबें अपनी जिंदगी खुद जीती हैं
समीक्षा, आलोचना ख्ुाद सहती,
किसी लाइब्रेरी में सांस लेती,
करती हैं इंतजार कोई तो उसके घूंघट के पट खोले।
बड़ी दुर्भागी होती हैं वैसी किताबें-
जिन्हें नहीं मिल पाता दुल्हा,
कोई कोई तो ब्याह के बाद भी
प्यार के लिए तड़पती रहती हैं,
पन्ने तक नहीं पलटे जाते।

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