पौधे की आस

गर्मी की चिलचिलाती धूप में

लेकर चले मुझें जमीन में दफनाने

दफन हुआ थोड़ी राहत आई नमी से

नमी ने किया मुझ पर परहार

आना पड़ा फिर मुझे घरती से बाहर

खुस होता नन्हा सा अंकुर से बना पौंधा

फिर वही चिलचिलाती धूप में खड़ा होना पड़ा

सोचा अब तो कुछ भी हो जाय न करेगें जीवन बरबाद

फल अंन्न धूप की छाया बनकर

जीवन क्रर्तब्य निभायेगें हम साथ

काले बादल की आश पर खड़ा

रहा निरंतर विनती अस्वीकार

ना वर्षा न बरसने दिया मासूम घटा को

होना था मुझे सावन बरखा जैसे तर-बतर

पास आये बादल फिर गुजर गये कहीं दूर

मन की आस टूटी कहनें लगी फिर व बात

जिसने जनमाया था उसकी कैसे मिटेगी भूख

तिलमिला उठा व झुलसा पौंधा

अरे व गरजने वालों कब बरसोगे हम पर

दया भाव भर आओ नेनन से बूदें बरसाओ

उसकी भी आश मेरी भी प्यास

उस काली घटा पर नजरे बिछाई है

अब विनती पुकार किसको करू

कैसें जीवन अपना पूरा करू

अरे बदली बदलें की भावना

ना रखो इस नम के पौंधे से

अब तो मेरे ही नयन हो गये तर

जल रहा है तू सूरज की तपन से

आ तू भीग ले मुझसे ही लेले जल

अब में बादल बन जाऊ तू बन जा पौंधा

सबकी आश पूरी करूगा ना कठोर हृदय बनूँगा

बरस कर तर बतर कर दूँगा धरती आज

जिसने मुझ पर आश लगाई

जीवन उसका भी होगा धन्य

मिले मुझे फिर आर्शीवाद

बनकर आऊ धरती पर बादल

ना सुखेंगे नम के पौंधे

मुझको दे दो एसो भाग्य.

One Response

  1. kuldeep 26/06/2016

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