कहा गये बचपन के दिन

कहा गये वो बचपन के दिन,

जब हमारे भी पानी की जहाज चला करती थी,

कागज की बनाई आकृतियाँ भी,

आसमान में उडान भरा करती थी ॥१॥

 

रंग बिरंगी पतंगे जब ऊपर उठती,

हवाओं को चीरती गगन को चूमा करती थी,

कंचे की छण छण ध्वनियाँ,

गलियारों में निमंत्रित किया करती थी ॥२॥

 

गुल्ली डंडे की शाम जब,

दूर दूर तक भगाया करती थी,

पापा के जल्दी घर आने पर,

फिर जमकर, बेदर्दी से पिटाई होती थी ॥३॥

 

सूरज की तप्पति किरणों में,

जब गंगा तट पर जाया करते थे,

घर से छुपकर, स्कूल से भाग कर,

शहर में फिल्में देखा करते थे, ॥४॥

 

रूठ के बाहर जाने पर जब,

माँ खुद चल कर, मनाने आया करती थी,

कहा गये वो बचपन के दिन जब,

दादी माँ लोडी गा कर, आँचल में सुलाया करती थी ॥५॥ 

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