गज़ल-२

उनकी हर बात , रातों में , याद आती है ,
नींद भी हमसे , आँखों को , चुराती है |

चाँद से बढ़के , वो नूँरानी , तेरा चेहरा था ,
अब भी तेरी हंसी , आ कानो को , खनकाती है |

वक़्त मिलता तो , तुम्हे कहते , जो दिल में था ,
वक़्त अब है तो , नहीं हो तुम , कमी खाती है |

हक़ तुम्हे है ये , चुनो अपने , जानिशा दिलबर को ,
अपने हक़ का गला , तो किसमत , घोंटे जाती है |

तुम सही हो मगर , इक बात , तुम्हे कहते है ,
हम ग़लत है ये , नहीं बात , सही जाती है |

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