रिक्शे वाली

वो
सुबह से न जाने कितनी बार-
बार बार झांक कर आ चुकी है लेटर बाॅक्स,
न चिट्ठी आई,
न वो आया।
कह के गया था-
खखार कर,
मैं पहुंचते ख़त लिखूंगा,
न बार चूक नहीं होगी,
कहां चूक हो गई उससे।
वह अंतिम मुलाकात-
अब तलक उसके आंखों के कोर में लटके पड़े हैं,
आशा की आखिर बूंद को संभाले,
वो यूं ही हर दिन,
लड़ आती है बुढ़े डाकिए से।

रिक्शे वाली
रात दस बजने को हैं-
रिक्शा को कहीं नहीं जाना,
न रिक्शे वाली को।
घूमा रहा है-
रिक्शा वाला,
कि कोई मिल जाए और वो चली जाए,
आज क्या हुआ,
न ग्राहक न लोग,
पुलिस भी तो नहीं।
कोई तो ले जाए उसे-
मगर भाग्य को कोसने से क्या,
ग्राहक तो आते नहीं,
रिक्शे पर बैठी,
कागज से शाल से ढकती,
बार बार,
नजरें फेरती,
पर कुछ भी नहीं दिखता।
आज बुखार में तपता उसका बदन-
लाख बार मना करता,
आज नहीं सह सकता,
जोर किसी और देह का।
करना पड़ता है जबरन अपने देह से-
जान चुकी है रिक्शे वाली,
अगर लात नहीं खाना उसका,
तो हर शाम,
निकलना ही पड़ेगा उसे।

Leave a Reply