अनजानी सी राह

अनजानी सी राह पर चलता रहा वह निरुदेश्य।

न थी उसकी कोई मंजिल, न था कोई लक्ष्य।

बस सामने थी एक अनंत राह-

जिसका न था कोई ओर न कोई छोर।

उसने किसी हमसफर से न की कभी कोई बात-

न पूंछी कुशलात, बस चलता ही रहा।

पल भर को न किया ठहराव,

न ठिठका क्षण भर किसी सघन वृक्ष की छाँव में-

करने को श्रम दूर।

लगता था उसको, था केवल चलते रहने का जूनून।

न किया कभी नैसर्गिकता का दर्शन, न अवलोकन-

वातावरण में पसरी सुषमा का।

उसने न कही अपनी, न सुनी किसी की व्यथा कथा,

न द्रवित हुआ मन किसी की देख कर दुर्दशा।

अब वह अपने निरुदेश्य भटकने से ऊब चूका था-

टूट चूका था।

वह थककर, भरभरा कर गिर पड़ा।

उसके प्राण पखेरू उड़ चले थे अनन्त आकाश में-

किसी अनजानी मंजिल की ओर।

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