जश्न-ए-सैफई

जश्न-ए-सैफई
जश्न-ए-सैफई मना रहा है वो
ज़ख्म ताजा है, जला रहा है वो
रोते-बिलखते चेहरे उसको नहीं पसंद
ठुमको पें , मस्ती के ठहाके लगा रहा है वो

लाखों की साइकिल पें सवार होके
सादगी की नुमाईश कर रहा है वो
इससे उमदा मजाक क्या होगा
अपने को पाक-साफ बता रहा है वो

एक तरफ नेताओं की गुंडई नज़र आती
सफेदी में कालिख की कलई खुली जाती
रखवाला खूंखार बना , रक्षा खाक करेगा
अबलाओं पें लाठी-डंडे औ लातें बरसा रहा है जो

सरकार इसे कहते है , मालूम नहीं था
बयान में हर सीन को झूठला रहा है जो
जलते को जलाना, ज़ख्मी को ज़ख्म दें
इंसा को सताके इतरा रहा है वो

– सत्येन्द्र कात्यायन
आज उत्तर प्रदेश में बिगडती फिजा से सभी वाकिफ है, दंगों ने जो ज़ख्म दिये वो भरें नहीं, और यहां के मुखिया अपने पिता के साथ महोत्सव का आनंद लूटते है और साथ ही इनकी टीम के सफेद पोश अपनी गुंडई का रौब जमाते है…पुलिस महिलाओं के साथ इतनी बेशरमी से पेश आती है तो हर महिला ही नहीं एक पुरुष भी बौखला उठे, भीतर तक हलचल मच जाये और इस सिस्टम को पल में खाक करने का जी करें…..इन्हीं भावों को बयां करती है ये मेरी ताजा गज़ल जो अभी अभी लिखी है कम से कम इस सरकार को आईना दिखाया जायें……….जयहिन्द !
जय भारती !वन्दे भारती!!
-सत्येन्द्र कात्यायन
-रचनाकार: सत्येन्द्र कात्यायन satya

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