अस्थि विसर्जन

मोहोब्बत प्यासी
एक झलक ज़रा सी
देखने को मचले
सच की सीमायें
पर चाहत मेरी
सुहागन दासी
चुप सब सहके
भी प्रेम बरसाएँ
आत्मा नभ की
निर्मल निवासी

सुनने को हैं
तो बहुत से किस्से
सुना पर किसने
तन्हाई के हिस्से
जिसमे प्रचलित
संगम और काशी
जाने जलकर
वो गया कहाँ
इतना चलकर
वो छुपा कहाँ
तप ही सच था
तो क्या ये
जिंदगी, मिथ्या सी

 – नितिन परिहार ‘राजा’

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