कवि-कविता

कविता ने जग के काज को सहज कराया ।
क्रोध कोलाहल कठिन काटि सुहृदय बनाया॥
करुणा कारण सुचि सागर शांतिका गोता खिलाया ।
निरा कुतूहल बाल भाव बन चमक धमक दिखाया ॥
मोह लोभ लालच चंचलता चपल हृदय नीद न लाए ।
कलह द्वेष स्व अनुचर ला जहाँ -तहाँ बसाया ॥
सदाचार सौरभ संदेश देश में ला यहाँ- वहाँ फैलाया ।
सौन्दर्य चकित जग अंचल अगनित ललक दिखाया ॥
चित्त उचटन पर प्रकृति छटा मनोहर दिखी निराली ।
सुख दु:ख आनन्द क्लेश में करती सबकी रखवाली ॥
विस्मय भरे नैन से कल्पना की छाया करे रखवाली ।
सागर जल भीतर भारत बिच अनुपम छटा निराली ॥
चमत्कार की चाह चातुर्ता की कविता करती रखवाली ।
अंत: करण की कोमलता सुर सुन्दरता की करे सवारी ॥
भक्ति भाव की भक्तों में भक्ताई भरके भलाई करती भारी ।
कवि के कोमल कर कमलों को सुगम सच्चाई भरती सारी ॥
मन भावन छाया दिखलाकर कुटिल भाव भगाती ।
वन पर्वत नदी नाद नव पल्लव दे- दे मन भरती ॥
चित्रकूट के रम्य छटा का गुणगान मनोहर करती ।
गिरते न्याय से ऊपर उठ भूखे को जल पान कराती॥
दु:ख दारिद्र का भान कराकर જ્ઞાन की सरिता बरपाती ।
झोपड़ी झरोखे रम्य वादियों किसानों का सद्गुन गाती ॥
हित साधन अन्याय-न्याय मंदिर-मस्जिद महात्म सुनाती ।
लाभ कराती -हानि दिखाती वातमंडल सुरम्य बनाती ॥
मृत्यु नही होती कवियों की विचलित होना स्वाभाविक है ।
कविता निज प्रिय सरिता श्रोत से गोता खाती जाती है ॥
उसमें जो कुछ रहेगा मनोहर वही हमारे जग काम का है ।
उससे ही होगा निज गौरव अपने सपने नाम दाम का है ॥
कवि के स्वर में प्रकृति की रहती सदा ही नूतन- तान है ।
निज वाणी बल विद्या विदित बात बनाती मान- धनवान है ॥

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  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 13/08/2017

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