बरसात करा के न जाइए

वर्षों टूटी झोपड़ी,
सबेरे गुसैयाँ महल बना के न जा ।
मौसम गर न आवे,
कित्रिम बरसात करा के न जा ।
साधन सब संदूक में,
इन नयनों को सुखा के न जा ।
डग डूबा हृदय मरुस्थल,
आँसू नयन में ढ़रका के न जा ।
सखिया चढे पहाड़,
गुलगुले पंचर करा के न जा ।
मौसम सदा बहार बह,
रंग रोदन करा के न जा।
वे मौसम खिली कलियाँ ,
गलियाँ सँवार के न जा ।
जैसा दाम वैसा काम ,
जौहर दिखा के न जा ।
अंधाधुंध उड़ान चढ़े,
टकसाल लुटा लुटा के न जा।
त्योरी चढ़ी चाँद,
मुखड़ा दिखा दिखा के न जा ।
दागी गर जहाँ के,
सस्ता वेद थमा के न जा ।
महलें आलीशान बढ़े,
सर सड़क बना- बना के न जा ।
झोली में फकीर के दोआना,
उबला भात फैला के न जा ।
मूद रहीं पलकें तपन ,
मूसला धार बरसात बरपाके न जा।

Leave a Reply