करती हो

तुम भी हमारी ही तरह क्या धमाल करती हो
क्या कहूं बात करती हो, तो कमाल करती हो

कभी भी होता नहीं मुझे रंज इस गरीबी का
करोड़ों की मुस्कान से मालामाल करती हो

ज़माना बीता विवाह हुए हैरान हूँ तुम्हे देख
आज भी अपने गाल शर्म से लाल करती हो

बिछा पलकें स्वागत तो कभी स्नेह तुम्हारा
हमेशा कुछ न कुछ देकर निहाल करती हो

बच्चों के लिए सब न्यौछावर किया सदा तुमने
न चुभे जीवनभाले उन्हें,खुद को ढाल करती हो

गजब की सहनशक्ति दी उस निराकार ने तुम्हें
गलती हमारी फिर भी न कभी सवाल करती हो

अगले जन्म में बनना चाहता है तुम जैसा “चरन”
तुम जो भी करती हो सच में बेमिसाल करती हो
_________________________________
त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

Leave a Reply