ग़ज़ल

मुख से वो यूं ना कहके, क्यूं ज़ुल्म ढहाते हैं,
इक बार तो वो कहदें , जो हम चाहते हैं।

क्या जाने वो के दूर से,ही दे देते हैं वो ज़ख़्म,
दिन रात सुबहो-शाम,हम हर वक्त कराहते हैं।

एक वक्त था जब प्रेम से,वाकिफ़ नही थे हम,
हर लम्हा तुम्हे पाने की, अब तरकीब जुटाते हैं।

अश्कों से भर लिया है , मुहब्बत का ये बरतन,
कब प्यासी बनोगी तुम , ये आस लगाते हैं।

दिन रात मे अ कमशिन,ख़्वाबो मे तुम हो छाई,
इक पल तेरे ख़्वाबो में , हम जगह चाहते हैं।

मुकेश गुजेला “बघेल”

One Response

  1. mahendra gupta 23/12/2013

Leave a Reply