प्रेम विकृत सम्मान विकृत

पंकज कुमार मिश्रा “वात्स्यायन” द्वारा लिखी गयी कविता

है प्रेम विकृत सम्मान विकृत,

नैतिकता मानसिकता विकृत।

कैसे कल्याण विश्व का हो,

हो गयी है मानवता विकृत।।

पग फिसले उसके वह जो गिरा,

हंस पड़ा था मेरा मन विकृत।

तन काला उसका वस्त्र फटा,

देख हुआ था मेरा तन विकृत।।

है बना हुआ आवास पाप का,

हो गया है मेरा धर्म विकृत।

घायल को पीड़ित छोड़ वहीँ,

बढ़ चला था मेरा  धर्म विकृत।।

मन धर्म विकृत तन कर्म विकृत,

नैतिकता-मानसिकता विकृत।

कैसे कल्याण विश्व का हो,

हो गयी है मानवता विकृत।।

चौराहों पर गोली चलती,

बम की गूंजों से गगन विकृत।

नव वधुओं के सोलह श्रृंगार,

जलते यौवन से अगन विकृत।।

कोई ठिठुर-ठिठुर निष्प्राण हुआ,

सूरज की तेज़ तपन विकृत।

प्रतीक मनुज अन्यायी हुआ,

ईश्वर तेरा ये सृजन विकृत।।

गगन विकृत सृजन विकृत,

सूरज क तपन अगन विकृत।

कैसे कल्याण विह्व का हो,

हो गयी है मानवता विकृत।।

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