जब कण चावल के पकवान बने***

चले सुदामा कृष्ण से मिलने घबराये घबराये
पत्नी ने जो दी थी भेंट, अंदर वे उसे छिपाये
पहचानेंगे बाल सखा मन थी दुविधा भारी
पहुँच गए वे द्वारका नगरी सकुचाये सकुचाये

भरी सभा में मिला संदेशा मित्र सुदामा आये
सबने देखा कान्हा, नंगे पांव दौड़ते जाये
गले लगाकर वे बोले कैसे हो मित्र सुदामा
चरण सुदामा के प्रभु अपने अश्रु से धुलवाये

रुक्मणी सत्यभामा अचंभित, श्याम नैन भर आये
भोज सजे पकवान बने पर कृष्ण नहीं चख पाये
जो भेंट सुदामा लाये थे प्रभु जानते थे अंदर से
चावल के वे कण प्रभु, पकवान समझ कर खाये
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त्रुटि हेतु क्षमा हेतु प्रार्थी — गुरचरन मेहता

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