मुझे छोड़कर

क्या होगा मेरा, हैं यहाँ सब के सब होशियार मुझे छोड़कर I
चाहते है दीदार, सभी हैं बस उसके तलबगार मुझे छोड़कर II

जब लगी डूबने कश्ती मेरी बीच मझधार, तभी पता चला,
माझी ने दी यहाँ तो सभी के हाथ में पतवार मुझे छोड़कर I

जरा सी हुई क्या परेशानी कि कर दिया मकान खाली उसने,
कोई मकां मालिक नहीं यहाँ सभी हैं किरायेदार मुझे छोड़कर I

मैंने कभी न देखा कोई फ़ायदा नुक्सान कभी दोस्ती में यारों,
हूँ न बेवकूफ अब कैसी यारी सभी हैं दुकानदार मुझे छोड़कर I

चुनाव का मौसम जो आया तो चल दिए हाथ जोड़कर सभी,
दुशाशन के वंशज कम्बख्त सभी हैं मक्कार मुझे छोड़कर I

मैं तो सच का गुलाम हूँ जनाब, बात कहता हूँ ज़रा दिल से ,
इसलिए ही मोड़कर सच से मुह सभी हैं लाचार मुझे छोड़कर I

न कर्ज़ा दिया न लिया ही कभी किसी से जिंदगी में अब तक,
सब के दरवाजे पर होती है तभी, लम्बी कतार मुझे छोड़कर I

जिन्हे समझा था कभी अपना, भेद खुला तो जाना “चरन”
सभी के दिल में था बैर और एक बड़ी सी दरार मुझे छोड़कर II
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त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

 

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