क्या क्या देखा

बचपन देखा जाता मैंने जाती जवानी देखी I
बुढ़ापा आये, जाए न जीवन की कहनी देखी I
अंतकाल हो मस्तिष्क, काम नहीं फिर करता,
विनाश काले विपरीत बुद्धि बाते स्यानी देखी II

बंधन जो दिल के दिल से थे उनको टूटते देखा I
बच्चों को ही मात-पिता को मैंने लूटते देखा I
साधारण व्यक्ति की औकात दो कौड़ी की यारों,
मंत्री की बेटी के बदले मैंने आतंक छूटते देखा II

मुंह में भर भर कर लड्डू मैंने रेवड़ी बांटते देखा I
क्या नेता-क्या अभिनेता मैंने सबको काटते देखा I
क़ानून की बातें बड़ी बड़ी जो करते थे बढ़चढ़ कर,
राजनीति में उनको भी मैंने तलवे चाटते देखा II

बीच भंवर में डूबती नैया मैंने मझदार को देखा I
अपनों ने हे अपनों को किया ऐसे लाचार को देखा I
पेट की आग किसे कहतें है क्या बतलाऊँ तुमको,
रोटी के बदले खून किया मैंने गुनहगार को देखा II

मन के खेत में दुश्मनी के बीज रोंपते देखा I
दोस्तों को यारी की पीठ में खंजर घोंपते देखा I
क्या होती है जिंदगी दो लफ़्ज़ों में हूँ बताता,
पेट भरे किसी तरह मैंने इज़ज़त सौंपते देखा II
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त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

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