मेरा मन एक आस का पंछी

मेरा मन एक आस का पंछी-

स्वयं भी भटकता है मुझे भी भटकाता है।

वह चलता है आगे आगे और मै बंधा किसी अदृश्य डोर से-

उसके पीछे दौड़ता चला जाता हूँ।

मै कभी थक कर रुक जाता हूँ,

वह देखता है मुड़ कर, करता है मेरा उत्साह्बर्धन

और मै पुन: उसका अनुसरण करने लगता हूँ।

अति उत्साहित हो वह कभी उड़ जाता है ऊँचे आकाश में,

पड़ कर कभी नैराश्य के गर्त में-

गहरे सागर में डूबने उतराने लगता है।

छिप कर किसी बदली की ओट में करके आँख मिचोली-

मुझे बहलाने, भरमाने लगता है।

पता नहीं उसके यों भटकने, भटकाने से-

कभी मिल भी पायेगा अभीष्ट।

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