आईना

सामने से देखा, तो कोई था -२

पीछे जाकर देखा, तो कोई ना मिला

फिर सामने आकर देखा, फिर कोई था -२

फिर पीछे जाकर देखा, फिर कोई ना मिला

 

मैं हेरान हुआ, मैं परेशान हुआ

जरा सी देर दिखता है, क्षण भर में खो रहा हैं

क्या हैं ये माजरा, समझ में नहीं आ रहा हैं

आखिर मेरे साथ ये क्या हो रहा हैं

 

फिर सामने आकर देखा, फिर कोई था

मेरे जैसे पहने थे कपडे, मेरे जैसा ही चेहरा था

फिर मैंने पूछा तू कौन हैं? तेरा क्या नाम हैं?

तू जल्दी बता दे भैया,  हम तो परेशान हैं

 

इतने में एक सज्जन ने मुझसे पूछा

भाईसाहब, आप किससे मुखातिब हो रहे हैं

हम बोले, साहब ! हमारे सामने हैं कोई

हम उसी की शरारतों पर तो रो रहे हैं

 

मैं होठ चलाता हूँ, तो वो भी चलाता हैं

मैं हाथ हिलाता हूँ, तो वो भी हिलाता हैं

इधर से दिखता हैं, उधर से नहीं दिखता

समझ नहीं आता, क्या हैं ये किस्सा

 

उन्होंने गौर से देखा और कहा

साहब ये तो आईना हैं

इसका काम हैं अनूठा

एक के दो बनाना हैं

 

इसके अंदर जो दिखते हैं, वो आप ही हैं

चिंता ना करो साहब, इसकी बात ही ये है

मैं बोला, साहब ! इसे यहाँ किसने लगाया हैं

इसने एक शरीफ को, पागल बनाया हैं

 

इसे तो फौजियों को दे देना चाहिए

फौजी लडेगा एक, तो लड़ेगे दो-दो

गोली चलेगी एक, तो चलेंगी दो-दो

दुश्मन मरेगा एक, तो मरेंगे दो-दो

 

मगर रखना होगा बचाकर इसे

नकली नोट छपने वालों से

वर्ना, वो नोट छापेंगे एक

और, नोट छपेंगे दो-दो

 

ज्ञानेश शर्मा उर्फ़ “ज्ञान रसीला”

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