अंधा दौड़ रहा आंधी के आगे

बगुले बैठे पेड़ की डाली ले धागे ।
ममता मोह मोदक सभी थे त्यागे ।’।
संयम तोड़ कनक-कनक स भागे ।
गाँव शहर टूट छुट रहे कोई तो जागे।।
संयम टूट रहे टूटते श्र्नृंग बहुत अभागे ।
कलरव करने वाली पક્ષી वालक बढें आगे।।
पिछड़े ना साहित्य सिथिल ना होवें राजे ।
मौलिकता गुम हो ना मनबढ को जागे ॥
गलियों के कुत्ते भौचक जाने क्यों जागे ।
अंधा दौड़ रहा जाने क्यों आँधी के आगे ॥

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