बहिनों की पुकार

बढ़े न भ्रष्टाचार अत्याचार जग उबार ।
बुद्धि- बल बिलसित जन्म मनुज तुम्हार ॥
भाषा सिखा हृदय अद्भुत हो बढ़े निखार ।
कृपण बन सानन्द समेटे स्वयं करें सुधार ।।
ज्वलित ज्वलंत दु:ख दावानल कहे विचार ।
सोते जगते खाते पीते रोते हंसते बढ़े निखार ॥
त्राहि-त्राहि करता हाहाकार नारी दु:ख अपार।
छल में क्रान्ति भीषण भ्रम व भाषण में व्यापार ॥
कुलषित कर कलयुग काँपता देख ते दुराचार ।
मुक्के मार मार कर दुराचार नीचे देहु गिरा ॥
चिल्लात बिलबिलात अकुलात अति अत्याचार ।
पिछली पगडंडी पकड़ी, न्याय करे के गुहार ।।
लखी लेखनी बढ़ी बजार भ्रष्टाचार निहार ।
एक-एककर नव दुर्ग अनेकों बढे चढे विचार ॥
साम दाम अर दंड भेद दुर्गम दु:ख दुधार ।
उन अंगरेजो का याद कराता भारी भार ॥।
बीर बहादुर बाकुरे हिंद के कर लेकरतलवार ।
त्राहि-त्राहि जहाँ में माँ ममता की चित्कार ॥
सबका साहस बढ़ा खुली साँस वही वयार ।
जीवन जीने की जतन जुगति भूमि हमार ॥
व्रह्म भोज तर्पण अर्पण नूतन दिखा निखार ।
गाँव शहर लहर बहिनों का मिला अधिकार ॥
कहा कही कहन बड़न की धोखा दिया निकार ।
छेड़-छाड़ तलवार तान छोड़ शक्ति सघन संचार ॥
होश उड़े थे अच्छे-अच्छों के कवि का वन्द विचार।
हक से हार जीत जन जीवन हक बहनों की पुकार ॥

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