मेरे नव गीत –पद्मा मिश्रा

मेरे नव गीत –पद्मा मिश्रा 
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,

गोल घिरते जिन्दगी के व्यूह इतने,
हर मोड़ पर ज्यों घूमती है गोल रोटी
फिर भी कोई आस मन की अनबुझी सी,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,
मै घुमाती हूँ समस्याओं के पट पर,
उलझनें आटे सी गीली,
भूख सी फैली हुई है आंच मन की,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,
कल फिर खिलेगा क्षुधा का विकराल सूरज,
फिर सजेगा घर का कोई एक कोना,
थालियों में सज उठेंगी कामनाएं,
फिर कोई सपना दिखाती प्यास होगी,
सब्जियों सी काटती हूँ,दर्द की हर रात बीती,
सिंक रही हैं  भावनाएं रोटियों सी.
दाल पकती ज्यों कोई भूली कहानी,
हास हल्दी का.., नमक सी पीर जग की,
प्रार्थनाएं छौंक सी बेवक्त उठतीं,
घुट रही साँसों में जीवन की उदासी.
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी.
यह रसोईं है मेरे सपनो की दुनिया,
-मधुरता कविता में निशि दिन घोलती हूँ,
चाकुओं को धार देती ,सोचती हूँ,
कर रही हूँ धार पैनी अक्षरों की
और गढ़ रही हूँ गीत कोई स्वप्न दर्शी,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी. —-पद्मा मिश्रा ,

[2]

स्वागत है आज नए सूरज का स्वागत है!,
स्वर्णिम किरणों की डोरी थामे,
आया है वर्ष नया, स्वागत है, स्वागत है!
नए नए सपने हैं,नूतन आशाएं हैं,
साँसों की धड़कन ने गीत नए गए हैं,
खुशियों की प्यास जगी फिर मन में,,स्वागत है,
स्वागत है आज नए सूरज का स्वागत है!,
भूलें हम जो कुछ भी खोया, या पाया था,
बीत गया जीवन, अतीत जो पराया था,
नव प्रभात बेला में नवयुग की बात करें,
सपने साकार करें, हमने जो चाहा था,
श्रद्धा विश्वास भरा ,स्वागत है, स्वागत है!
स्वागत है आज नए सूरज का स्वागत है!
मंजिल की और चलें, एक कदम our बढ़ें
काँटों को साथ लिए फूलों की बात करें,
पथ की दूरी कैसी?,काँटों का क्या गम है?
साहस के आगे तो पर्वत नतमस्तक हैं,
दृढ़ता विश्वास लिए स्वागत है, स्वागत है!
स्वागत है आज नए सूरज का स्वागत है.

[3]
सागर तट पर ……

जब मुक्त हवाओं का मौसम लहराता है ,

सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है
लहरों सा चंचल जीवन का गतिमय आनन् ,
मन- भावों की सरिता को छूता मुक्त गगन ,
उन्मुक्त तरंगों का नर्तन मन भाता है .
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है .
झुक रहा गगन देखो सागर की थाती पर ,
जल दर्पण में बिम्बित कितने ही तारागण ,
नयनो की गागर में सपनों के मेघ पलें
मन का वह कोमल भाव छलक ही आता है ,
 सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है
मैं उदधि,समाहित मुझमे,कितनी नदियों का मन,
कितनेतूफानो का साहिल ,मेरा यह अंतर्मन,
छू लो ,मेरी प्यार भरी गरिमा साथी !,
मन का हर कोमल गीत ,ह्रदय भरमाता है
 सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।
जीवन तट सा ही है विशाल  ,यह मुक्तांगन,
बालुकमयी धरती करती है अभिनन्दन ,
इस स्नेह सलिल के पावन तट पर हम दोनों ,
जैसे धरती का मन अम्बर अपनाता है ,
 सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।
आरम्भ यहीं है ,अंत यहीं -आशाओं का ,
सतरंगीसपनो का मौसम -अभिलाषाओं का ,
उत्ताल तरंगों पर सोया मेरा सावन ,
सिहरा तन मन ,बूंदों का रिमझिम भाता है,….
 सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।।।।।
 नदी-सागर-और दोस्ती”

दूर रह कर भी नहीं जो टूटती है,
अनकही सी भावनाएं जोडती है,
दोस्ती अहसास की कच्ची कली है,
जो कहानी धडकनों में सोचती है.
दोस्ती ऎसी नदी है जिन्दगी की,
धार बन बहती रही हैं भावनाएं,
मन का सागर पा सके न दो किनारे,
लहर संग ढलती रही हैं कामनाएं.
साथ चलना है हमें सागर किनारे,
पर लहर के साथ हम बहने न पायें
मिल न पायें हम,भले ही युग युगों तक,
रास्ते विश्वास के मिटने न पायें.
कल कभी तुम साथ आओ या न आओ,
मै अकेली ही चलूंगी कर्म पथ पर,
बस यही अहसास हो संबल हमारा ,
तुम हमेशा ही मेरे अहसास में हो…….!
कह उठा सागर ‘समर्पण हूँ तुम्हारा,
दूर हो, फिर भी मगर -हर सांस में हो.

One Response

  1. gopi 14/12/2013

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