शहर में अंधेरा है

सूरज बिखेरता उजाला मगर,
धरा को अंधेरे नें घेरा है ।
उजाले को चुराया अंधेरो नें,
उन अंधेरो में मेरा घर बसेरा है ।
अपना घर फूक ओ ढूढते रोशनी,
अपना शहर कहे ठाव में अंधेरा है ।
जब कभी धरोहर के चिराग जले,
आस्था की बस्ती में उजाला है ।
जो चारो तरफ घना अंधियारा तो,
इक टिमटिमाते दीपक का सहारा है ।
मिल जलाओ सारे दिये साथ में,
एक दिया कोई अलग जलाया है ।
यूँ तो मंदिरों में देवी-देवता चुप बैठे,
युगों-युगों से शहर में अंधेरा है ।
सब भागते हैं छाँव की तलाश में,
हर डाल देखा बाज का बसेरा है ॥

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