बेटी

कौन सा अपराध मेरा ,

क्यों विलग करते मुझे

हूँ अविकसित भ्रूण मैं

जन्म लेने माँ मुझे दे ….

बधिर हूँ ना सुन सकूं ,मैं

कौन सी त्रुटि हो गयी

मौन हूँ जो मुख नहीं,माँ

याचना  न कर सकीं ….

हाथ हैं इस्थिर  हमारे

जो कस्ट पहुंचाते नहीं

पैर भी गतिमान न हैं

माँ तुझे दौड़ते नहीं ….

प्रकृति  का संयोग ये है

गर्भ   में पोषित  तुम्हारे

अस्थि ,मज्जा ,रुधिर तेरा

स्वांस भी   तेरे   सहारे ……

आँख भी है ना खुली

देख सकती   हूँ  नहीं

माँ ,तुम्हारी गोद   में

है खेलने की आस मेरी ……

निर्बल दया की पात्र मैं

नस्ट अब मत   कीजिए

पल्लवित   हों   बेटियां

माँ -माँ    को जन्म  दीजिये .

 

 

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