रहना चाहता था मै निरापद

रहना चाहता था मै निरापद, बचता रहा नदी, नाले और बम्बे से,

नहीं छुआ भडकते शोलों को, रहा दूर बिजली के खम्बे से।

बचते बचाते भी एक दिन भारी कयामत आ गई,

मेरी भोली नज़र उनकी शातिर आँख से टकरा गयी।

आग सी तन मे लगी, झंकृत तार दिल के हो गये,

नहीं हो सके थे हम किसी के, अब उन्हीं के हो गये।

लहराया जब आंचल उन्होंने मै उसकी झपट मै आ गया,

धीरे से बड़ी जोर का झटका मेरा दिल खा गया।

मै आदमी था काम का उनके इश्क ने निकम्मा कर दिया,

लोगों ने बदल कर नाम मेरा अब हरम्मा कर दिया।

हे प्रभो ना करना हाल ऐसे अपने किसी बन्दे के,

ना डालना किसी को फेर में इस इश्किया निकम्मे के।

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